शाम की आगोश से
सिमट कर जब रात आती हे
लगता हे ये पेड़ों की पतियाँ भी ,
सो जाती हैं
लगता है मेरी तरह ख्याब नहीं देखती है
लगता हे ये अपनी
पीर्यतम टहनियों से प्यार करती हैं
इसीलिय चुपचाप मंद मंद हवा के
गीत गाती
सो जाती है
रात को जब हवाओं के झोंको मैं
ये झूमती
लगता है ये जैसे
कोई स्वप्न देखती है
और नाचती गाती है
इसीलिय ये कभी
इधर बल खाती है कभी उधर बल खाती है
और जीए जाती है
ये पेड़ों की पतियाँ
ये ज़ालिम मोसम
इन्हें अपने प्रीतम टहनी से
प्यार भी नहीं करने देता है
इसलिय पतझड़ के मोसम मैं
हर पाती सुख जाती है
और अपनी प्रीतम टहनी से
बिछुड़ जाती हैं
ये टहनियां
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