बीती रत चला मैं
साँझ को सस्नेह विदाई देके
अनमने से अनजाने पथ पे
मुझे देख रहा रहा था कोई
हा वो मेरी करीब की साथी थी
जो हमेशा मेरे गले मैं
गलबैयां डाले रही हे
बहुत चाहती हे वो मुझे
मैंने जब bhi उससे
अपने से अलग करने की कोशिश की
उतनी ही वो मेरे और करीब आ गई
कमबख्त मरती भी नहीं
उसकी चिता भी नहीं जलती
हाँ क्योंकि
वो मेरी चिरसंगनी हे
हाँ जब मेरी चिता जलेगी
तभी वो मेरे साथ सती होगी
हाँ मेरी गरीबी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें