रविवार, 27 जुलाई 2014

मुझे याद हे जब से मैंने दंगे देखे या सुने हैं कभी कोई नेता नहीं मरता है |मरता हे गरीब इंसान, ओर  नेता उसकी मौत पर बस रोटी सेंकता हे|
1994 जब मैंने मीडिया मैं कदम रखा ओर आज तक ऐसे कई मोकों को देखा हे | दंगो की शुरुआत जब कभी भी हुई बजह कोई मामूली रही ओर
उसको बाद मैं तूल दे दिया गया | आखिर हम कब जा कर समझेंगे हम अपने बच्चों को कोंन  सा कल देना चाहते हैं  ,नफरत से भरा कल या
प्यार से भरा कल | ये एक अजीब सी पहेली हे, हैं तो हम इंसान लेकिन बाँट कर रख लिया ये, हिन्दू, ये मुसलमान, ये सिक्ख, ये ईसाई, ओर
धर्म के नामपर एक दूसरे का सिर फोड़ते रहते हैं  | अगर बाजुओं मैं  इतना ही जोश है, तो देश, शहर, गाँव के विकास के लिए लगाओ |लेकिन
वो जिम्मा किसी ओर का हे हम तो सिर्फ गंदगी करेंगे
अभी कुछ महीनो पहले मेरे शहर मैं ऐसा ही दंगा हुआ था ,बात बड़ी मामूली थी |एक मस्जिद के सामने  बुजुर्ग इंसान ने अपने हाथों को पानी से
धो लिया, ओर उसके वो हाथ धोने की वजह ने दंगे का रूप ले लिया, ओर जिस शख्स ने ये किया जैसा मुझे पता चला वो मेरा दोस्त था |
जब हम कभी साथ होते थे ,मुझे कभी नहीं लगा कि वो ऐसा कर सकता हे, उसकी सोच बहुत परीपक्व थी |लेकिन उस वक़्त जब ये हुआ वो
बेरोजगार था | दिमाग से भी काम से भी ओर उसका फ़ायदा उठाया उन नेताओं ने जो कि सिर्फ इंतज़ार करते हैं, कब ऐसा हो ओर आग मैं घी 
डालें | भाई ये घी बहुत महंगा है ,ऐसे घी को खरीदना बंद करो देश ओर अपनी तरक्की के लिए कुछ करो | एक बात मुझे ओर खलती हे इन
नेताओं की अगर कहीं दंगे हो गए तो आरोप एक दूसरे पर क्यों लगाते हो ये देश ये शहर आपका हे क्यों नहीं एक साथ जा कर रोक देते हो इन
दंगो को,  लेकिन अगर ये ऐसा करेंगे तो हवन मैं हाथ कैसे सेंकेंगे | ये जनता कब समझेगी उखाड़ फेंको ऐसी सरकार को ऐसे नेताओं को जो
हमारे अपनों की लाशों पर नेता गिरि करते हैं , हम तो कहते हैं , मानना ना मानना इस मूर्ख जनता का हे जो समझती तो सब कुछ हे लेकिन
उसको वही करना हे जो उसके नेता चाहते हैं ,धन्य हो ऐसी जनता का |
बाँट लो सुख जो दुख बांटते हो
क्यों अपने कल को बांटते हो 
मर गया तो क्या जबाब देगा 
तेरा बच्चा जब तुझसे सवाल पूछेगा 
खौफ ना खुदा का ना भगवान का हे 
वो भी यही कहता हे हम एक हैं 
फिर क्यों बांटते हो चिल्लर की तरह खुद को 
डर उस खुदा, भगवान से जो तुझे 
कहता है
प्यार कर ...
मुझे याद हे जब से मैंने दंगे देखे या सुने हैं कभी कोई नेता नहीं मरता है |मरता हे गरीब इंसान, ओर  नेता उसकी मौत पर बस रोटी सेंकता हे|
1994 जब मैंने मीडिया मैं कदम रखा ओर आज तक ऐसे कई मोकों को देखा हे | दंगो 

बुधवार, 19 सितंबर 2012

तुम धवल हो मेरा कल हो
तुमसे अब मैं क्या कहूँ
सोचता हूँ चुप रहूँ
साथ बस chलता रहूँ

तुमसे ही पाता हूँ मैं
प्रेरणा   जीवन की अक्सर
देखता जब भी हूँ मैं
तुम खड़े हो मेरे पथ पर

शाम हो या फिर सुबह
तुम ख्यालों मैं हो अक्सर
तुम बनो छाया मेरी
जब चलूँ जीवन के पथ पर




 रात भर चलता रहा चाँद
मेरे संग सफ़र मैं
मै  भी तन्हा वो भी  तन्हा   
दूर थे पर थे सफ़र मैं

शहर गुज़रा गाँव गुज़रा
और गुज़रा उनका घर
जिनसे मिलने को तरसते
हम रहे उम्र भर

कह सके न ढाई आखर
बस अधर हिलते रहे
प्रेम के एक बोल को
सुनने को तरसते रहे

रात  भर चलता रहा 
चाँद मेरे संग सफर मैं
मैं भी तन्हा वो भी तन्हा
दूर थे पर थे सफ़र मैं
कर के यकीं
हम तुम पर तो
सब कुछ
अपना वार गए    

लिख दिया कलम से
कागज़ पर
वो चाँद अछ र  मुझको मार गए
कुछ कहा नहीं कभी कोयल ने
पपीहे की पीऊ से हर गए

कुछ ऐसे कारे बादल बरसे
मेरे आंसू उनके साथ बहे
फाल्गुन के टेसू और पलाश
रंग ऐसे मुझ पर डार गए

चालत डगर टोंके हैं लोग
हाय जिंदा मुझको मार गये
बोलत नैना रीझत थे हमको
मुस्कान अधर की साथ लहे

मन ही मन तुम सोचत ही रहे
हम अभिलाषा का हार लिए
इस दुनिया से हार गये   

सोमवार, 17 सितंबर 2012

मन से दूर ख्यालों मैं
तेरे बारे मैं सोचा करते हैं
कैसा होगा उसका चेहरा
हर चेहरे को देखा करते है

क्या होगा चाँद सा मुखड़ा
या नैन तेरे हिरनी से
चलती होगी जब बल खाके
नागिन सी इस जमीं पे

केशु होंगे जैसे अम्बर पे
फैली काली घटाएँ
दो कलियाँ तेरे होंठ के प्याले
मधुरस पीने को चाहें

तेरा योवन सावन भादों
जैसे पतझड़ आने के बाद
खिल उठते हैं फूलों के बाग़
कोमल तेरी देह के जैसी
गुलाब की पंखुड़ी

टूट न जाये ये सपना मेरा
जो हम देखा  करते हैं
मन से दूर ख्यालों  मैं
तेरे बारे मैं सोचा करते हैं
मैं लिखूं तुम पर कविता
या मंगल गीत लिखूं
या साँझ सकारे चोबारे मैं
बस तुमको देखुं

कैसे कह दूँ
मृगनैनी से नैन तुमाहरे हैं
तुम बैठी अमराई पर
क्या कोयल हे

या बसंत ऋतू की
अम्बर से गिरती
रिमझिम बुँदे हो

मेरे  ह्रदय पर आछादित
तेरी शोख आदाओं का जादू
न आए तूं हर मौसम मैं
मैं कैसे कह दूं

तेरे जन्मों की परिभाषा
क्या यही हे मेरी अभिलाषा
इन उपमाओं की अभिलाषा मैं

क्या तूं हे मेरे
जीवन की आशा
कर के यकीं हम तुम पर तो
सब कुछ अपना वार गए
लिख दिया कलम से कागज़ पर
वो चंद  अछऱ   मुझको मर गए
कुछ कहा नहीं कभी कोयल ने
पपीहे के पीऊ से हर गये
कुछ ऐसे कारे बादल बरसे
मेरे आंसू उनके साथ बहे
फाल्गुन के टेसू और पलाश
रंग ऐसे मुझ पर डार गए
चलत डगर टोंके हे लोग
हाय जिंदा मुझको मर गये
बोलत नैना रीझत थे हमको
मुस्कान अधर की साथ लहे
मन ही मन तुम सोचत ही रहे
हम अभिलाषा का हर लिए
इस दुनिया से हर गये