सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

kalam


अब ये कलम किसी को न दूंगा 
जब भी लिखूंगा इसी से लिखूंगा 

हर सब्द को जादुई रंग मैं रगुंगा
अब इस कलम से नया इतिहास रचूंगा                                                                                                अब ये कलम किसी को न दूंगा

है स्याही मैं इन्द्रधनुषी रंगों का समावेश

जैसे अनेकों संस्क्रती मैं बंटा भारत देश 
जिसके पग पग पर बोल और बदले है भेष
 लेकिन जिसकी परिभाषा है,  चाहत नहीं किसी से द्वेष 
ऐसे ही शब्दों को तुमको अर्पण मैं करूँगा
कभी गीत कभी ग़ज़ल मैं लिखूंगा
 प्रेम मैं विरह के गीत अब तुझे न दूंगा
सात स्वर संगीत के सजे कुछ ऐसा लिखूंगा
अधर पे हो ख़ुशी प्रीत ऐसी मैं करूँगा
क्या ये सब मैं लिख सकूँगा

vishvas

विश्वास
किया अपने आप पर  
दूंगा उस बिखरी को च्वनी 
बस  स्टाप पर 
जो मुझे रोज़ मिलता 
फैलाता हे हाथ हर के सामने 
पर उनमें से किसी एक सिक्का मिलता हे 
उसका उस जगह तोज मिलना
और मेरे विश्वास का ,रोज़ दमन होना 
क्या साबित करता हे 
यही की जब खुद न कर सके विश्वास 
तो किसी और पर कैसे होगा इस तरकी के माहोल मैं 
हर आदमी के विश्वास का रोज़ हनन होगा 
यह विश्वास इन्सान को इन्सान के  प्रति बैरी बना रहा हे 
फिर भी इन्सान विश्वास किये जा रहा  हे

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

hreday

नदियाँ जैसे करती कल कल 
चलती हैं हर पल अविरल 
वैसे ही देख तुमेह पिर्ये 
मेरा ह्रदय करता हलचल
नील निलय अम्बर के नीचे 
जब सुनता हूँ  पंझी का कलरव 
वैसे ही -------------------- 

मस्त पवन जब चलती हे 
कलियाँ आवें फल फुल लगें 
भँवरे भी मद मस्त हुए गगन मैं 
जैसे तन से तेरे खुसबू फैले  
वैसे ही पीर मेरे ह्रदय मैं उठती हे 
हर पल अविरल  
वैसे ही ===========

सिनेग्ध भरा तेरा स्पर्श 
लगा जैसे कहीं बिजली कडकी 
खोल तभी अपने ह्रदय की खिड़की 
ढूंड रहा हूँ कहीं तूं तो भटकी 
तब आशा और निराशा के छा गए बादल
वैसे ही -------------------------------
खिल कीचड़ मैं कमल हुआ जो                                                                                                                    वो हे कल्पना का अनुगामी 
प्रीत से नाता क्या तोडूं 
मीत मेरा निर्झर निर्मल                                                                                                                            वैसे ही -------------
सरगम सी जब तूं बोली थी
ह्रदय मैं जब मेरे ढोली थी                                                                                                                          अब भीगीं  मेरी ऑंखें हैं 
शबनमी रोज की रातें हैं
अब याद नहीं करता हूँ हरपल
अब नहीं देख तुमेहं पिर्ये
मेरा ह्रदय करता हलचल







शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

chamchon ki jay bolo

बैठा मुस्काया मुहं खोला 
बहुत पुराना चमचा बोला  
सुनो सख्झी है जग सारा 
लम्बा हे इतिहास हमारा 
चमचा नर चमची नारी हे 
चमचों की संतित सारी हे 
कोई बड़ा हे कोई छोटा हे  
यह पतला वह मोटा हे 
यह इस अफसर का चमचा हे 
और वह घर घर का चमचा हे
यह चमचा हे घर वाली का 
और वह चमचा हे साली का 
सत्य सनातन है यह प्यारे
चमचे ही चमचे  हैं सारे   
मीठे मीठे बोल सुनाये                                                                                                                           चमचे सब संताप मिटायें 
जय बुलति जो बार बार हे 
चमचों  का ही चमत्कार हे  
बिगड़ रही हो बात बना लो  
जो चाहो वो कम करालो  
हाकिम के चमचों पर जाओ 
हाथ जोड़ कर भोग लगाओ 
अंतर की आँखों को खोलो
बोलो चमचों की जय बोलो   
मूलमंत्र ये रखो याद 
चमचा गीरी जिंदाबाद
 














 





 

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

अधूरे पते


हमें हमेशा राहों मैं
या पीपल की छाओं मैं
बहुत मिले हैं हमराही
कुछ वादों की कुछ यादों की
या साथी बन अपने बेगानों की
वो भूल भुलेया बातों की
वो होठों की वो आँखों की
वो चल चलन सोगातों की
वो संकरी संकरी गलियों से
ओझल तो हुए वो पलकों से
raat  नशे मैं बह निकली
कुछ ऐसी वो बैरन निकली
,लेकिन वो तो अधूरी राहों मैं
दीप जलाये आये ना
मैं कैसे पहुंचू उन तक तो
क्योंकि वो तो अधूरे पते थे

कल की ही बात थी

क्यों टूटते रिश्ते
व्यथित मन दुन्ड़ते रिश्ते
कल की बात थी
वो मेरे पास थी
संजोय सपने नयन मैं
दुन्द्ती शयन मैं

क्यों टूटते रिश्ते
क्यों जुड़ते हैं रिश्ते
पैदा हुए जब हम
जैसे कल भोर की बात थी
मुहं से निकले बोल
उसमें माँ मां की आवाज़ थी
मां मेरी कहती हे
तेरी तोतली आवाज़ थी
मुझ से मेरी मां का रिश्ता
वो पहली सोंगात थी

कल की बात थी ------
चंद महने बीत गए
और हम दोड गए
तोतले जो बोल थे
वो पीछे छुट गए

मां से रिश्ता जोड़ के
पापा के रिश्ता आ गए
मां ने दिया परिचय सभी का
कोन बुआ ,भाई बहन
कोन छोटा कोन बड़ा
देखता हूँ क्या सभी का
पाप का था भरा घड़ा
वो भी फिर होले होले मेरे पीछे पड गए

देखते ही देखते कुछ साल बीत गए
पड़ने के लिए जब हम स्कूल भेजे गए
वहां के अजनबी भी मेरे साथ जुड़ गए
रिश्तों की इस कड़ी मैं एक कड़ी जुड़ गई
जब मेरे पीछे एक लड़की हाथ धोके पड गई
बीतते फिर चले दिन बड़े प्यार से
क्या पता था ये रिश्ता
हे दिन दो चार के
हुआ फिर तबादला मेरे तो बाप का
छुट गया फिर एक शहर
रिश्तों की राख का
उसमें भी उस लड़की की
सबसे प्यारी याद थी
कल की ही बात थी
वो मेरे साथ थी

सहर

सहर हो गई । लेकिन शहर नहीं है
बातें हैं हर किसी की , पर साथ नहीं हे

चुप हैं कुछ लोग , जो सिर्फ सुनते हैं
लकिन शब् से निकल कर कुछ सपने बुनते हैं
रूचि है पर किसमें ख्यालों मैं खोने की
या अनसुलझी सी पहलियों को सुलझाने की
चश्मों के अन्दर चश्में
ख्याल रखते हैं
हर किसी का
खूबी समझने की
बातें कम करने की
भरोसा जताती हैं
रूचि की रूचि
चलो अनिद्रा ही सही
कुछ बात तो कही
सो जाती तो
सहर कैसे होती
और बातें भी ----------------------

एक रात गुजरती हे


एक रात गुजरती हे, जैसे मोती चुनती हे .
सपनों की देहलीज़ पर बंद नहीं होती पलकें
जाने क्या क्या बुनती हैं
रंग हैं जो मिटने का नाम नहीं लेते हैं
बातें करते रहें हम शब्द ख़त्म नहीं होते
जाने क्यों लम्बी मुझे रात ये लगती हे
सपनों की देहलीज़ पर --
क्यों सागर मैं पनपते हैं
चंदा से दमकते हैं
पर चाँद मैं हे दाग मोती ,मोती से चमकते हैं
तूं मोती सी लगती हे
सीप से तेरे नेनों मैं सपनों का समुन्दर है
जिसमें हैं असंख्य मोती
तूं गिरने नहीं देती हे
शबनमी रात की बूंदों को लबों से चुनती है
बंद नहीं होती पलकें
जाने कब सुबह ने पंख फैलाय हैं
स्वछ निर्मल धवल मोती से
मेरे घर आंगन आये हैं
भर लेती उनको बाँहों मैं
बयार जो मैं होती
बंद नहीं होती ------
आकाश जैसे सीने पर
जो सर रख दूँ अपना
मोती से खिले कमल की
पथ तो बनती हे
मैं धरा तेरे जीवन की
नीर क्या तेरी पीर
कम नहीं होती बंद नहीं होती पलकें जाने क्या क्या बुनती हैं