अब ये कलम किसी को न दूंगा
जब भी लिखूंगा इसी से लिखूंगा
हर सब्द को जादुई रंग मैं रगुंगा
अब इस कलम से नया इतिहास रचूंगा अब ये कलम किसी को न दूंगा
है स्याही मैं इन्द्रधनुषी रंगों का समावेश
जैसे अनेकों संस्क्रती मैं बंटा भारत देश
जिसके पग पग पर बोल और बदले है भेष
लेकिन जिसकी परिभाषा है, चाहत नहीं किसी से द्वेष
ऐसे ही शब्दों को तुमको अर्पण मैं करूँगा
कभी गीत कभी ग़ज़ल मैं लिखूंगा
प्रेम मैं विरह के गीत अब तुझे न दूंगा
सात स्वर संगीत के सजे कुछ ऐसा लिखूंगा
अधर पे हो ख़ुशी प्रीत ऐसी मैं करूँगा
क्या ये सब मैं लिख सकूँगा
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