चलती हैं हर पल अविरल
वैसे ही देख तुमेह पिर्ये
मेरा ह्रदय करता हलचल
नील निलय अम्बर के नीचे
जब सुनता हूँ पंझी का कलरव
वैसे ही --------------------
मस्त पवन जब चलती हे
कलियाँ आवें फल फुल लगें
भँवरे भी मद मस्त हुए गगन मैं
जैसे तन से तेरे खुसबू फैले
वैसे ही पीर मेरे ह्रदय मैं उठती हे
हर पल अविरल
वैसे ही ===========
सिनेग्ध भरा तेरा स्पर्श
लगा जैसे कहीं बिजली कडकी
खोल तभी अपने ह्रदय की खिड़की
ढूंड रहा हूँ कहीं तूं तो भटकी
तब आशा और निराशा के छा गए बादल
वैसे ही -------------------------------
खिल कीचड़ मैं कमल हुआ जो वो हे कल्पना का अनुगामी
प्रीत से नाता क्या तोडूं
मीत मेरा निर्झर निर्मल वैसे ही -------------
सरगम सी जब तूं बोली थी
ह्रदय मैं जब मेरे ढोली थी अब भीगीं मेरी ऑंखें हैं
शबनमी रोज की रातें हैं
अब याद नहीं करता हूँ हरपल
अब नहीं देख तुमेहं पिर्ये
मेरा ह्रदय करता हलचल
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