एक रात गुजरती हे, जैसे मोती चुनती हे .
सपनों की देहलीज़ पर बंद नहीं होती पलकें
जाने क्या क्या बुनती हैं
रंग हैं जो मिटने का नाम नहीं लेते हैं
बातें करते रहें हम शब्द ख़त्म नहीं होते
जाने क्यों लम्बी मुझे रात ये लगती हे
सपनों की देहलीज़ पर --
क्यों सागर मैं पनपते हैं
चंदा से दमकते हैं
पर चाँद मैं हे दाग मोती ,मोती से चमकते हैं
तूं मोती सी लगती हे
सीप से तेरे नेनों मैं सपनों का समुन्दर है
जिसमें हैं असंख्य मोती
तूं गिरने नहीं देती हे
शबनमी रात की बूंदों को लबों से चुनती है
बंद नहीं होती पलकें
न जाने कब सुबह ने पंख फैलाय हैं
स्वछ निर्मल धवल मोती से
मेरे घर आंगन आये हैं
भर लेती उनको बाँहों मैं
बयार जो मैं होती
बंद नहीं होती ------
आकाश जैसे सीने पर
जो सर रख दूँ अपना
मोती से खिले कमल की
पथ तो बनती हे
मैं धरा तेरे जीवन की
ऐ नीर क्या तेरी पीर
कम नहीं होती बंद नहीं होती पलकें जाने क्या क्या बुनती हैं
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