विश्वास
किया अपने आप पर
दूंगा उस बिखरी को च्वनी
बस स्टाप पर
जो मुझे रोज़ मिलता
फैलाता हे हाथ हर के सामने
पर उनमें से किसी एक सिक्का मिलता हे
उसका उस जगह तोज मिलना
और मेरे विश्वास का ,रोज़ दमन होना
क्या साबित करता हे
यही की जब खुद न कर सके विश्वास
तो किसी और पर कैसे होगा इस तरकी के माहोल मैं
हर आदमी के विश्वास का रोज़ हनन होगा
यह विश्वास इन्सान को इन्सान के प्रति बैरी बना रहा हे
फिर भी इन्सान विश्वास किये जा रहा हे
किया अपने आप पर
दूंगा उस बिखरी को च्वनी
बस स्टाप पर
जो मुझे रोज़ मिलता
फैलाता हे हाथ हर के सामने
पर उनमें से किसी एक सिक्का मिलता हे
उसका उस जगह तोज मिलना
और मेरे विश्वास का ,रोज़ दमन होना
क्या साबित करता हे
यही की जब खुद न कर सके विश्वास
तो किसी और पर कैसे होगा इस तरकी के माहोल मैं
हर आदमी के विश्वास का रोज़ हनन होगा
यह विश्वास इन्सान को इन्सान के प्रति बैरी बना रहा हे
फिर भी इन्सान विश्वास किये जा रहा हे
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