बुधवार, 30 नवंबर 2011

बीती रत

बीती रत चला मैं


साँझ को सस्नेह विदाई देके


अनमने से अनजाने पथ पे


मुझे देख रहा रहा था कोई


हा वो मेरी करीब की साथी थी


जो हमेशा मेरे गले मैं


गलबैयां डाले रही हे


बहुत चाहती हे वो मुझे


मैंने जब bhi उससे


अपने से अलग करने की कोशिश की


उतनी ही वो मेरे और करीब आ गई


कमबख्त मरती भी नहीं


उसकी चिता भी नहीं जलती


हाँ क्योंकि


वो मेरी चिरसंगनी हे


हाँ जब मेरी चिता जलेगी


तभी वो मेरे साथ सती होगी


हाँ मेरी गरीबी


वर्षा

टिप टिप ठपर-ठपर
छोड़ के अपनी डगर
ये बहता हे
पानी किधर
ये तो वर्षा रानी
जो नाच रही झूम झूम के
पट पट
बहुत जोर के बुलबुले उठते
लिए बहुत अरमान
पल भर मैं गायब हो गए
घास फूस पेड़ों की पति
चमक उठी आज तो साथी
झूम उठा जामुन का पेड़
कहता हे वर्षा रानी से
क्या खूब किया तुमने कमाल
अब फल फूलेगी मेरी जामुन
खायेंगे ये बच्चे नादान
तभी जोर से बदल धड़का
बिजली को de आदेश तो kadka
जाके गिर कहीं पर
ओ मेरी बैरन
बिजली फिर जोरों से कडकी
भागे घरों को लड़के लड़की

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

मैं चाहूँ

मैं चाहूँ कोई मुझे प्यार करे
थपकी दे दे दुलार करे
सरे राहों मैं पकडे
बैयाँ मोरी
कोई ऑंखें मुझ से चार करे
मतवारे कमल के नैनं से
शबनम जैसे मोती हैं गिरे
पीलूं होटों से मैं उनको
मदिरा की जरुरत फिर न परे
मैं चाहूँ मुझे कोई प्यार करे
पाजैब पैर मैं पहनोंऊँ
सिंदूर से उसकी मांग सजाउँ
छोड़ बाबुल का देश वो गोरी
मेरे आंगनवा पांव धरे
मैं चाहूँ मुझे कोई प्यार करे
जब छाए गम की बदली
वो अपना आंचल लहराए
जीवन की डगर पर चलने को
वो पथ मैं खड़ी इंतजार करे
मैं चाहूँ कोई मुझे प्यार करे

पानी

अब तो राहों मैं गर्म लपटें चलती हैं
जो इस मर्मर देह को जलती जाती हैं
कुछ ही दूर चलता हूँ कि
मुहं प्यास से सूखने लगता हे
लेकिन प्यास कैसे बुझाऊ
पानी भी अब पैसे मैं बिकता हे
इसलिए उस पानी से
अब प्यास नहीं बुझती हे
यहाँ कहानी का अंत नहीं अनंत हे
क्योंकि यहाँ पे इंसानों का खून पीने वाले कुछ ऐसे संत हैं
जो आदर्श चिंतन का ढोंग रचते हैं
लेकिन फिर भी नहीं मरते हैं
क्योंकि
वो भैंसा बाला भी डरता हे
इसीलिय हर रोज़ एक ईमानदार मरता हे मैं सिहर उठता हूँ क्योंकि मैं हर रोज़ मरता हूँ
इसलिय उनसे कहता हूँ
पानी मत बेचो
क्योंकि मेरी तरेह हर रोज़ कोई नहीं मरेगा
इसलिए उसे गर्म लपटें भी शीतल प्रतीत होंगी
उनका मुहं प्यास से नहीं सूखेगा
और भैंसा वाला भी उन सफ़ेद पोशों से नहीं डरेगा

सुबह की शाम

जब हमारे पग उठे
बेहताशा पूरब की और
दिल मैं सागर हिलोरे लेने लगा
और पुरबिया की बयार
होले होले मेरे तन के मन के
पास से गुजरने लगी
मुझे एहसास होने लगा, तेरी खुशबु का
चेहरे पर
कई बार टकराकर चली गई
और भीगी भीगी ओस की कुछ बुँदे
मेरे माथे पर गिरीं एहसास हुआ
तेरे अश्कों का मैं सोया हुआ सा जग उठा
चोंका सा
हाथ मैं कलम और अपनी अँगुलियों से जब तू सो रही थी
और मैं सफ़र मैं था
तेरे सपनों की माला बुनने के लिए
चन्दन से लिपटे सर्प की खुशबु के साथ
और ठंडी ठंडी हिमालय की चोटियों को जगाकर
क्या तू इतना सोई
कि अंतरात्मा का जबाब भी न दे
मैं आ रहा हूँ तेरे सपनों को तोड़ने
तेरे पास हकीकत मैं
क्या तू अब नहीं उठेगी
भोर कि बेला मैं
उगते हुए सूरज मैं क्या मेरा चेहरा नहीं देखेगी

स्वर्ण लालिमा सी प्रतीत होगी
जब तेरे चेहरे से उसकी किरने टकराएंगी
मैं मर के जी उठूँगा
छह पल भर के लिए
लकिन तू मुझे अपना बनायेगी
मैं किसी अंजन से नहीं कहूँगा
कि कभी तुने मुझे चाहा था
मैं भूल जाऊंगा कि गाँव की पगडंडी पर तुम्हारे कांधे से कन्धा मिलाकर चला था
हाँ मुझे सकूँ मिला था
मैं कोई शिकायत नहीं कर रहा हूँ
भूल जाने की
लेकिन क्या तू मुझे भूलेगी
तेरा वो दुर्घटना मैं
एक गिफ्ट का पैकेट देना
बड़ा रास आया
मेरे पास अभी तक मोजूद हे
मे उसे संजो कर रखूँगा
अपने सग्रहालय मैं
क्या तुम देखने आओगी
नहीं हाँ न
चलो कोई बात नहीं
लेकिन तेरे साथ सिनेमा देखने जाना
मुझे याद रहेगा
बीच मैं हमारे बैठा
मैं सोच रहा था वो कब उठे
और हमारे फासले कम हो
मैं उदास हो चला

और सीडियों की
मुंडेर पर आकार बैठे गया
लेकिन क्या तुने सोचा मेरे दिल पर क्या बीती
लेकिन नहीं
तू हंसती रही
उस हंसी मे एक दर्द का एहसास हुआ था मुझे
जो मेरे तन मे सुई सी चुभो रही थी
जैसे कोई खजूर की पाती
हाँ तुने पाती भी दी मुझे
पहली पाती
उसी दिन तो सिनेमा देखा था
बड़ा हंगामा हुआ था गाँव मैं
बड़ा मज़ा आया
लेकिन तुम जब रोई
तो मुझे बहुत बुरा लगा
सिर्फ तुम हंसती रहो
मे यही तो चाहता हूँ
तुम ने कहा
मेरे शब्दकोष मैं कोशिश शब्द नहीं
लेकन यह सब कोशिश ही तो था
जो मैंने तुमसे और तुमने मुझ से की
और जाने के बाद जो तुमसे बातें कि
वो अधूरी थी उन्हें पूरा करने आ रहा हूँ
तुम्हारा वो बड़े प्यार से दम आलू बनाना और
अपने और मेरे गम को भूल जाना
तुम यों ही न भूल जाना प्यार से खिलाना
तुम्हें चम्मच नाम देना
तुम्हें बुरा तो नहीं लगा मैं फिर कभी नहीं कहूँगा
तुम्हरी सों
धीरे -धीरे प्रातः कालीन बेला आने वाली हे
और तुम अलसाई अंगड़ाई सी उंनीदी सी
उठने वाली हो

मेरी सुबह की उजाला
मेरे होंठों का प्याला
न मुझ से भूल हुई चलो अब माफ़ भी कर दो न
तुम मेरा साथ दोगी न
तुम हंसती
और
जागती ही मिलना

चेहरे पर सुबह की लालिमा लिए
मैं आ रहा हूँ
मेरी सुबह की शाम

माया

मैंने एक बार सोचा की
मैं अपने अतीत झाँककर तो देखूं
लेकिन मेरा अतीत मेरी हंसी उडाने लगा
माया का नाम न जाने कहाँ से लेने लगा
मेरा अंतर्मन चोंका बिना शिकन लिए चेहरे पे
क्योंकि भरोसा था मुझे अपनी माया पे
क्योंकि वो हमेशा मेरे साथ चलेगी
और फिर मैं अपने अतीत मैं झाँकने लगा
मुझे मालूम भी नहीं था कि
कब उस बैरन माया ने मुझे छला
मेरे पग कब बढ चले उस और
फिर मिला मुझे परिचय पत्र
बस यहीं से शुरू होता हे
फिर न विराम लेने वाली माया का इतिहास
लेकिन सम्पूर्ण नहीं हुआ
पता नहीं उसकी किस
अदा ने मुझे छला
और मैं भूलकर शेह्तुत से भी मीठे
इमली से खट्टे कागज़ पे
और उस भोली सी माया ने
मुझे अपने आँचल की चाय मैं
विश्राम दिया
अधुरा ठहराव था वो
जो की पूरा न हुआ
आज भी जब मैंने
उस बिंदु से पूछा
तो पता चला की

वो पराई हो गई हे
लेकिन क्या वो सकुचाई होगी
मेरी याद आई होगी
नहीं माया माया हे
न मेरे पास न उसके पास
आज भी जब कहीं माया का जिक्र आता हे
मेरा अतीत मुझे कोसने लगता हे
पता नहीं ये माया
हर किसी को क्यों भाती हे
क्या अब भी माया को मेरी याद आती होगी
बस स्म्रेतियाँ ही बाकी हैं