मंगलवार, 29 नवंबर 2011

पानी

अब तो राहों मैं गर्म लपटें चलती हैं
जो इस मर्मर देह को जलती जाती हैं
कुछ ही दूर चलता हूँ कि
मुहं प्यास से सूखने लगता हे
लेकिन प्यास कैसे बुझाऊ
पानी भी अब पैसे मैं बिकता हे
इसलिए उस पानी से
अब प्यास नहीं बुझती हे
यहाँ कहानी का अंत नहीं अनंत हे
क्योंकि यहाँ पे इंसानों का खून पीने वाले कुछ ऐसे संत हैं
जो आदर्श चिंतन का ढोंग रचते हैं
लेकिन फिर भी नहीं मरते हैं
क्योंकि
वो भैंसा बाला भी डरता हे
इसीलिय हर रोज़ एक ईमानदार मरता हे मैं सिहर उठता हूँ क्योंकि मैं हर रोज़ मरता हूँ
इसलिय उनसे कहता हूँ
पानी मत बेचो
क्योंकि मेरी तरेह हर रोज़ कोई नहीं मरेगा
इसलिए उसे गर्म लपटें भी शीतल प्रतीत होंगी
उनका मुहं प्यास से नहीं सूखेगा
और भैंसा वाला भी उन सफ़ेद पोशों से नहीं डरेगा

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