जब हमारे पग उठे
बेहताशा पूरब की और
दिल मैं सागर हिलोरे लेने लगा
और पुरबिया की बयार
होले होले मेरे तन के मन के
पास से गुजरने लगी
मुझे एहसास होने लगा, तेरी खुशबु का
चेहरे पर
कई बार टकराकर चली गई
और भीगी भीगी ओस की कुछ बुँदे
मेरे माथे पर गिरीं एहसास हुआ
तेरे अश्कों का मैं सोया हुआ सा जग उठा
चोंका सा
हाथ मैं कलम और अपनी अँगुलियों से जब तू सो रही थी
और मैं सफ़र मैं था
तेरे सपनों की माला बुनने के लिए
चन्दन से लिपटे सर्प की खुशबु के साथ
और ठंडी ठंडी हिमालय की चोटियों को जगाकर
क्या तू इतना सोई
कि अंतरात्मा का जबाब भी न दे
मैं आ रहा हूँ तेरे सपनों को तोड़ने
तेरे पास हकीकत मैं
क्या तू अब नहीं उठेगी
भोर कि बेला मैं
उगते हुए सूरज मैं क्या मेरा चेहरा नहीं देखेगी
स्वर्ण लालिमा सी प्रतीत होगी
जब तेरे चेहरे से उसकी किरने टकराएंगी
मैं मर के जी उठूँगा
छह पल भर के लिए
लकिन तू मुझे अपना बनायेगी
मैं किसी अंजन से नहीं कहूँगा
कि कभी तुने मुझे चाहा था
मैं भूल जाऊंगा कि गाँव की पगडंडी पर तुम्हारे कांधे से कन्धा मिलाकर चला था
हाँ मुझे सकूँ मिला था
मैं कोई शिकायत नहीं कर रहा हूँ
भूल जाने की
लेकिन क्या तू मुझे भूलेगी
तेरा वो दुर्घटना मैं
एक गिफ्ट का पैकेट देना
बड़ा रास आया
मेरे पास अभी तक मोजूद हे
मे उसे संजो कर रखूँगा
अपने सग्रहालय मैं
क्या तुम देखने आओगी
नहीं हाँ न
चलो कोई बात नहीं
लेकिन तेरे साथ सिनेमा देखने जाना
मुझे याद रहेगा
बीच मैं हमारे बैठा
मैं सोच रहा था वो कब उठे
और हमारे फासले कम हो
मैं उदास हो चला
और सीडियों की
मुंडेर पर आकार बैठे गया
लेकिन क्या तुने सोचा मेरे दिल पर क्या बीती
लेकिन नहीं
तू हंसती रही
उस हंसी मे एक दर्द का एहसास हुआ था मुझे
जो मेरे तन मे सुई सी चुभो रही थी
जैसे कोई खजूर की पाती
हाँ तुने पाती भी दी मुझे
पहली पाती
उसी दिन तो सिनेमा देखा था
बड़ा हंगामा हुआ था गाँव मैं
बड़ा मज़ा आया
लेकिन तुम जब रोई
तो मुझे बहुत बुरा लगा
सिर्फ तुम हंसती रहो
मे यही तो चाहता हूँ
तुम ने कहा
मेरे शब्दकोष मैं कोशिश शब्द नहीं
लेकन यह सब कोशिश ही तो था
जो मैंने तुमसे और तुमने मुझ से की
और जाने के बाद जो तुमसे बातें कि
वो अधूरी थी उन्हें पूरा करने आ रहा हूँ
तुम्हारा वो बड़े प्यार से दम आलू बनाना और
अपने और मेरे गम को भूल जाना
तुम यों ही न भूल जाना प्यार से खिलाना
तुम्हें चम्मच नाम देना
तुम्हें बुरा तो नहीं लगा मैं फिर कभी नहीं कहूँगा
तुम्हरी सों
धीरे -धीरे प्रातः कालीन बेला आने वाली हे
और तुम अलसाई अंगड़ाई सी उंनीदी सी
उठने वाली हो
मेरी सुबह की उजाला
मेरे होंठों का प्याला
न मुझ से भूल हुई चलो अब माफ़ भी कर दो न
तुम मेरा साथ दोगी न
तुम हंसती
और
जागती ही मिलना
चेहरे पर सुबह की लालिमा लिए
मैं आ रहा हूँ
मेरी सुबह की शाम
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