गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

पतझड़

शाम की आगोश से
सिमट कर जब रात आती हे
लगता हे ये पेड़ों की पतियाँ भी ,
सो जाती हैं
लगता है मेरी तरह ख्याब नहीं देखती है
लगता हे ये अपनी
पीर्यतम टहनियों से प्यार करती हैं
इसीलिय चुपचाप मंद मंद हवा के
गीत गाती
सो जाती है
रात को जब हवाओं के झोंको मैं
ये झूमती
लगता है ये जैसे
कोई स्वप्न देखती है
और नाचती गाती है
इसीलिय ये कभी
इधर बल खाती है कभी उधर बल खाती है
और जीए जाती है
ये पेड़ों की पतियाँ
ये ज़ालिम मोसम
इन्हें अपने प्रीतम टहनी से
प्यार भी नहीं करने देता है
इसलिय पतझड़ के मोसम मैं
हर पाती सुख जाती है
और अपनी प्रीतम टहनी से
बिछुड़ जाती हैं
ये टहनियां

बुधवार, 30 नवंबर 2011

बीती रत

बीती रत चला मैं


साँझ को सस्नेह विदाई देके


अनमने से अनजाने पथ पे


मुझे देख रहा रहा था कोई


हा वो मेरी करीब की साथी थी


जो हमेशा मेरे गले मैं


गलबैयां डाले रही हे


बहुत चाहती हे वो मुझे


मैंने जब bhi उससे


अपने से अलग करने की कोशिश की


उतनी ही वो मेरे और करीब आ गई


कमबख्त मरती भी नहीं


उसकी चिता भी नहीं जलती


हाँ क्योंकि


वो मेरी चिरसंगनी हे


हाँ जब मेरी चिता जलेगी


तभी वो मेरे साथ सती होगी


हाँ मेरी गरीबी


वर्षा

टिप टिप ठपर-ठपर
छोड़ के अपनी डगर
ये बहता हे
पानी किधर
ये तो वर्षा रानी
जो नाच रही झूम झूम के
पट पट
बहुत जोर के बुलबुले उठते
लिए बहुत अरमान
पल भर मैं गायब हो गए
घास फूस पेड़ों की पति
चमक उठी आज तो साथी
झूम उठा जामुन का पेड़
कहता हे वर्षा रानी से
क्या खूब किया तुमने कमाल
अब फल फूलेगी मेरी जामुन
खायेंगे ये बच्चे नादान
तभी जोर से बदल धड़का
बिजली को de आदेश तो kadka
जाके गिर कहीं पर
ओ मेरी बैरन
बिजली फिर जोरों से कडकी
भागे घरों को लड़के लड़की

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

मैं चाहूँ

मैं चाहूँ कोई मुझे प्यार करे
थपकी दे दे दुलार करे
सरे राहों मैं पकडे
बैयाँ मोरी
कोई ऑंखें मुझ से चार करे
मतवारे कमल के नैनं से
शबनम जैसे मोती हैं गिरे
पीलूं होटों से मैं उनको
मदिरा की जरुरत फिर न परे
मैं चाहूँ मुझे कोई प्यार करे
पाजैब पैर मैं पहनोंऊँ
सिंदूर से उसकी मांग सजाउँ
छोड़ बाबुल का देश वो गोरी
मेरे आंगनवा पांव धरे
मैं चाहूँ मुझे कोई प्यार करे
जब छाए गम की बदली
वो अपना आंचल लहराए
जीवन की डगर पर चलने को
वो पथ मैं खड़ी इंतजार करे
मैं चाहूँ कोई मुझे प्यार करे

पानी

अब तो राहों मैं गर्म लपटें चलती हैं
जो इस मर्मर देह को जलती जाती हैं
कुछ ही दूर चलता हूँ कि
मुहं प्यास से सूखने लगता हे
लेकिन प्यास कैसे बुझाऊ
पानी भी अब पैसे मैं बिकता हे
इसलिए उस पानी से
अब प्यास नहीं बुझती हे
यहाँ कहानी का अंत नहीं अनंत हे
क्योंकि यहाँ पे इंसानों का खून पीने वाले कुछ ऐसे संत हैं
जो आदर्श चिंतन का ढोंग रचते हैं
लेकिन फिर भी नहीं मरते हैं
क्योंकि
वो भैंसा बाला भी डरता हे
इसीलिय हर रोज़ एक ईमानदार मरता हे मैं सिहर उठता हूँ क्योंकि मैं हर रोज़ मरता हूँ
इसलिय उनसे कहता हूँ
पानी मत बेचो
क्योंकि मेरी तरेह हर रोज़ कोई नहीं मरेगा
इसलिए उसे गर्म लपटें भी शीतल प्रतीत होंगी
उनका मुहं प्यास से नहीं सूखेगा
और भैंसा वाला भी उन सफ़ेद पोशों से नहीं डरेगा

सुबह की शाम

जब हमारे पग उठे
बेहताशा पूरब की और
दिल मैं सागर हिलोरे लेने लगा
और पुरबिया की बयार
होले होले मेरे तन के मन के
पास से गुजरने लगी
मुझे एहसास होने लगा, तेरी खुशबु का
चेहरे पर
कई बार टकराकर चली गई
और भीगी भीगी ओस की कुछ बुँदे
मेरे माथे पर गिरीं एहसास हुआ
तेरे अश्कों का मैं सोया हुआ सा जग उठा
चोंका सा
हाथ मैं कलम और अपनी अँगुलियों से जब तू सो रही थी
और मैं सफ़र मैं था
तेरे सपनों की माला बुनने के लिए
चन्दन से लिपटे सर्प की खुशबु के साथ
और ठंडी ठंडी हिमालय की चोटियों को जगाकर
क्या तू इतना सोई
कि अंतरात्मा का जबाब भी न दे
मैं आ रहा हूँ तेरे सपनों को तोड़ने
तेरे पास हकीकत मैं
क्या तू अब नहीं उठेगी
भोर कि बेला मैं
उगते हुए सूरज मैं क्या मेरा चेहरा नहीं देखेगी

स्वर्ण लालिमा सी प्रतीत होगी
जब तेरे चेहरे से उसकी किरने टकराएंगी
मैं मर के जी उठूँगा
छह पल भर के लिए
लकिन तू मुझे अपना बनायेगी
मैं किसी अंजन से नहीं कहूँगा
कि कभी तुने मुझे चाहा था
मैं भूल जाऊंगा कि गाँव की पगडंडी पर तुम्हारे कांधे से कन्धा मिलाकर चला था
हाँ मुझे सकूँ मिला था
मैं कोई शिकायत नहीं कर रहा हूँ
भूल जाने की
लेकिन क्या तू मुझे भूलेगी
तेरा वो दुर्घटना मैं
एक गिफ्ट का पैकेट देना
बड़ा रास आया
मेरे पास अभी तक मोजूद हे
मे उसे संजो कर रखूँगा
अपने सग्रहालय मैं
क्या तुम देखने आओगी
नहीं हाँ न
चलो कोई बात नहीं
लेकिन तेरे साथ सिनेमा देखने जाना
मुझे याद रहेगा
बीच मैं हमारे बैठा
मैं सोच रहा था वो कब उठे
और हमारे फासले कम हो
मैं उदास हो चला

और सीडियों की
मुंडेर पर आकार बैठे गया
लेकिन क्या तुने सोचा मेरे दिल पर क्या बीती
लेकिन नहीं
तू हंसती रही
उस हंसी मे एक दर्द का एहसास हुआ था मुझे
जो मेरे तन मे सुई सी चुभो रही थी
जैसे कोई खजूर की पाती
हाँ तुने पाती भी दी मुझे
पहली पाती
उसी दिन तो सिनेमा देखा था
बड़ा हंगामा हुआ था गाँव मैं
बड़ा मज़ा आया
लेकिन तुम जब रोई
तो मुझे बहुत बुरा लगा
सिर्फ तुम हंसती रहो
मे यही तो चाहता हूँ
तुम ने कहा
मेरे शब्दकोष मैं कोशिश शब्द नहीं
लेकन यह सब कोशिश ही तो था
जो मैंने तुमसे और तुमने मुझ से की
और जाने के बाद जो तुमसे बातें कि
वो अधूरी थी उन्हें पूरा करने आ रहा हूँ
तुम्हारा वो बड़े प्यार से दम आलू बनाना और
अपने और मेरे गम को भूल जाना
तुम यों ही न भूल जाना प्यार से खिलाना
तुम्हें चम्मच नाम देना
तुम्हें बुरा तो नहीं लगा मैं फिर कभी नहीं कहूँगा
तुम्हरी सों
धीरे -धीरे प्रातः कालीन बेला आने वाली हे
और तुम अलसाई अंगड़ाई सी उंनीदी सी
उठने वाली हो

मेरी सुबह की उजाला
मेरे होंठों का प्याला
न मुझ से भूल हुई चलो अब माफ़ भी कर दो न
तुम मेरा साथ दोगी न
तुम हंसती
और
जागती ही मिलना

चेहरे पर सुबह की लालिमा लिए
मैं आ रहा हूँ
मेरी सुबह की शाम

माया

मैंने एक बार सोचा की
मैं अपने अतीत झाँककर तो देखूं
लेकिन मेरा अतीत मेरी हंसी उडाने लगा
माया का नाम न जाने कहाँ से लेने लगा
मेरा अंतर्मन चोंका बिना शिकन लिए चेहरे पे
क्योंकि भरोसा था मुझे अपनी माया पे
क्योंकि वो हमेशा मेरे साथ चलेगी
और फिर मैं अपने अतीत मैं झाँकने लगा
मुझे मालूम भी नहीं था कि
कब उस बैरन माया ने मुझे छला
मेरे पग कब बढ चले उस और
फिर मिला मुझे परिचय पत्र
बस यहीं से शुरू होता हे
फिर न विराम लेने वाली माया का इतिहास
लेकिन सम्पूर्ण नहीं हुआ
पता नहीं उसकी किस
अदा ने मुझे छला
और मैं भूलकर शेह्तुत से भी मीठे
इमली से खट्टे कागज़ पे
और उस भोली सी माया ने
मुझे अपने आँचल की चाय मैं
विश्राम दिया
अधुरा ठहराव था वो
जो की पूरा न हुआ
आज भी जब मैंने
उस बिंदु से पूछा
तो पता चला की

वो पराई हो गई हे
लेकिन क्या वो सकुचाई होगी
मेरी याद आई होगी
नहीं माया माया हे
न मेरे पास न उसके पास
आज भी जब कहीं माया का जिक्र आता हे
मेरा अतीत मुझे कोसने लगता हे
पता नहीं ये माया
हर किसी को क्यों भाती हे
क्या अब भी माया को मेरी याद आती होगी
बस स्म्रेतियाँ ही बाकी हैं

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

kalam


अब ये कलम किसी को न दूंगा 
जब भी लिखूंगा इसी से लिखूंगा 

हर सब्द को जादुई रंग मैं रगुंगा
अब इस कलम से नया इतिहास रचूंगा                                                                                                अब ये कलम किसी को न दूंगा

है स्याही मैं इन्द्रधनुषी रंगों का समावेश

जैसे अनेकों संस्क्रती मैं बंटा भारत देश 
जिसके पग पग पर बोल और बदले है भेष
 लेकिन जिसकी परिभाषा है,  चाहत नहीं किसी से द्वेष 
ऐसे ही शब्दों को तुमको अर्पण मैं करूँगा
कभी गीत कभी ग़ज़ल मैं लिखूंगा
 प्रेम मैं विरह के गीत अब तुझे न दूंगा
सात स्वर संगीत के सजे कुछ ऐसा लिखूंगा
अधर पे हो ख़ुशी प्रीत ऐसी मैं करूँगा
क्या ये सब मैं लिख सकूँगा

vishvas

विश्वास
किया अपने आप पर  
दूंगा उस बिखरी को च्वनी 
बस  स्टाप पर 
जो मुझे रोज़ मिलता 
फैलाता हे हाथ हर के सामने 
पर उनमें से किसी एक सिक्का मिलता हे 
उसका उस जगह तोज मिलना
और मेरे विश्वास का ,रोज़ दमन होना 
क्या साबित करता हे 
यही की जब खुद न कर सके विश्वास 
तो किसी और पर कैसे होगा इस तरकी के माहोल मैं 
हर आदमी के विश्वास का रोज़ हनन होगा 
यह विश्वास इन्सान को इन्सान के  प्रति बैरी बना रहा हे 
फिर भी इन्सान विश्वास किये जा रहा  हे

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

hreday

नदियाँ जैसे करती कल कल 
चलती हैं हर पल अविरल 
वैसे ही देख तुमेह पिर्ये 
मेरा ह्रदय करता हलचल
नील निलय अम्बर के नीचे 
जब सुनता हूँ  पंझी का कलरव 
वैसे ही -------------------- 

मस्त पवन जब चलती हे 
कलियाँ आवें फल फुल लगें 
भँवरे भी मद मस्त हुए गगन मैं 
जैसे तन से तेरे खुसबू फैले  
वैसे ही पीर मेरे ह्रदय मैं उठती हे 
हर पल अविरल  
वैसे ही ===========

सिनेग्ध भरा तेरा स्पर्श 
लगा जैसे कहीं बिजली कडकी 
खोल तभी अपने ह्रदय की खिड़की 
ढूंड रहा हूँ कहीं तूं तो भटकी 
तब आशा और निराशा के छा गए बादल
वैसे ही -------------------------------
खिल कीचड़ मैं कमल हुआ जो                                                                                                                    वो हे कल्पना का अनुगामी 
प्रीत से नाता क्या तोडूं 
मीत मेरा निर्झर निर्मल                                                                                                                            वैसे ही -------------
सरगम सी जब तूं बोली थी
ह्रदय मैं जब मेरे ढोली थी                                                                                                                          अब भीगीं  मेरी ऑंखें हैं 
शबनमी रोज की रातें हैं
अब याद नहीं करता हूँ हरपल
अब नहीं देख तुमेहं पिर्ये
मेरा ह्रदय करता हलचल







शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

chamchon ki jay bolo

बैठा मुस्काया मुहं खोला 
बहुत पुराना चमचा बोला  
सुनो सख्झी है जग सारा 
लम्बा हे इतिहास हमारा 
चमचा नर चमची नारी हे 
चमचों की संतित सारी हे 
कोई बड़ा हे कोई छोटा हे  
यह पतला वह मोटा हे 
यह इस अफसर का चमचा हे 
और वह घर घर का चमचा हे
यह चमचा हे घर वाली का 
और वह चमचा हे साली का 
सत्य सनातन है यह प्यारे
चमचे ही चमचे  हैं सारे   
मीठे मीठे बोल सुनाये                                                                                                                           चमचे सब संताप मिटायें 
जय बुलति जो बार बार हे 
चमचों  का ही चमत्कार हे  
बिगड़ रही हो बात बना लो  
जो चाहो वो कम करालो  
हाकिम के चमचों पर जाओ 
हाथ जोड़ कर भोग लगाओ 
अंतर की आँखों को खोलो
बोलो चमचों की जय बोलो   
मूलमंत्र ये रखो याद 
चमचा गीरी जिंदाबाद
 














 





 

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

अधूरे पते


हमें हमेशा राहों मैं
या पीपल की छाओं मैं
बहुत मिले हैं हमराही
कुछ वादों की कुछ यादों की
या साथी बन अपने बेगानों की
वो भूल भुलेया बातों की
वो होठों की वो आँखों की
वो चल चलन सोगातों की
वो संकरी संकरी गलियों से
ओझल तो हुए वो पलकों से
raat  नशे मैं बह निकली
कुछ ऐसी वो बैरन निकली
,लेकिन वो तो अधूरी राहों मैं
दीप जलाये आये ना
मैं कैसे पहुंचू उन तक तो
क्योंकि वो तो अधूरे पते थे

कल की ही बात थी

क्यों टूटते रिश्ते
व्यथित मन दुन्ड़ते रिश्ते
कल की बात थी
वो मेरे पास थी
संजोय सपने नयन मैं
दुन्द्ती शयन मैं

क्यों टूटते रिश्ते
क्यों जुड़ते हैं रिश्ते
पैदा हुए जब हम
जैसे कल भोर की बात थी
मुहं से निकले बोल
उसमें माँ मां की आवाज़ थी
मां मेरी कहती हे
तेरी तोतली आवाज़ थी
मुझ से मेरी मां का रिश्ता
वो पहली सोंगात थी

कल की बात थी ------
चंद महने बीत गए
और हम दोड गए
तोतले जो बोल थे
वो पीछे छुट गए

मां से रिश्ता जोड़ के
पापा के रिश्ता आ गए
मां ने दिया परिचय सभी का
कोन बुआ ,भाई बहन
कोन छोटा कोन बड़ा
देखता हूँ क्या सभी का
पाप का था भरा घड़ा
वो भी फिर होले होले मेरे पीछे पड गए

देखते ही देखते कुछ साल बीत गए
पड़ने के लिए जब हम स्कूल भेजे गए
वहां के अजनबी भी मेरे साथ जुड़ गए
रिश्तों की इस कड़ी मैं एक कड़ी जुड़ गई
जब मेरे पीछे एक लड़की हाथ धोके पड गई
बीतते फिर चले दिन बड़े प्यार से
क्या पता था ये रिश्ता
हे दिन दो चार के
हुआ फिर तबादला मेरे तो बाप का
छुट गया फिर एक शहर
रिश्तों की राख का
उसमें भी उस लड़की की
सबसे प्यारी याद थी
कल की ही बात थी
वो मेरे साथ थी

सहर

सहर हो गई । लेकिन शहर नहीं है
बातें हैं हर किसी की , पर साथ नहीं हे

चुप हैं कुछ लोग , जो सिर्फ सुनते हैं
लकिन शब् से निकल कर कुछ सपने बुनते हैं
रूचि है पर किसमें ख्यालों मैं खोने की
या अनसुलझी सी पहलियों को सुलझाने की
चश्मों के अन्दर चश्में
ख्याल रखते हैं
हर किसी का
खूबी समझने की
बातें कम करने की
भरोसा जताती हैं
रूचि की रूचि
चलो अनिद्रा ही सही
कुछ बात तो कही
सो जाती तो
सहर कैसे होती
और बातें भी ----------------------

एक रात गुजरती हे


एक रात गुजरती हे, जैसे मोती चुनती हे .
सपनों की देहलीज़ पर बंद नहीं होती पलकें
जाने क्या क्या बुनती हैं
रंग हैं जो मिटने का नाम नहीं लेते हैं
बातें करते रहें हम शब्द ख़त्म नहीं होते
जाने क्यों लम्बी मुझे रात ये लगती हे
सपनों की देहलीज़ पर --
क्यों सागर मैं पनपते हैं
चंदा से दमकते हैं
पर चाँद मैं हे दाग मोती ,मोती से चमकते हैं
तूं मोती सी लगती हे
सीप से तेरे नेनों मैं सपनों का समुन्दर है
जिसमें हैं असंख्य मोती
तूं गिरने नहीं देती हे
शबनमी रात की बूंदों को लबों से चुनती है
बंद नहीं होती पलकें
जाने कब सुबह ने पंख फैलाय हैं
स्वछ निर्मल धवल मोती से
मेरे घर आंगन आये हैं
भर लेती उनको बाँहों मैं
बयार जो मैं होती
बंद नहीं होती ------
आकाश जैसे सीने पर
जो सर रख दूँ अपना
मोती से खिले कमल की
पथ तो बनती हे
मैं धरा तेरे जीवन की
नीर क्या तेरी पीर
कम नहीं होती बंद नहीं होती पलकें जाने क्या क्या बुनती हैं