गुरुवार, 22 अप्रैल 2021

lockdown buddha

      

आज ये तय करना मुश्किल है, कि साँस अगले पल आएगी की नहीं ,, देश की हवा ही कुछ ऐसी हे।
क्योंकि आपकी साँसों पर आपका नहीं देश की सरकार ,, नेता,, सरकारी अमला,, अस्पताल,, चोर बाज़ार,, इनका ही अधिकार हे।
माना कि, इसमें उतना ही दोष इस जनता का हे,,, जो मस्जिद मंदिर के चक्कर मैं फँसती बार बार हे।
साल गुजर गया सरकार ने कुछ किया नहीं ओर जनता ने कुछ समझने की कोशिश ही नहीं की। वो कैसे,, 
सरकार चिल्लाती रही मास्क पहनो,, जनता क्यों मास्क पहने,,, इसमें भी राजनीति क्योंकि अगर सरकार भाजपा की हे तो मास्क नहीं पहनना हे। क्योंकि ये वाइरस भाजपा का हे तो लो भुगतो,, इसमें भी हमारे देश के  कुछ नेता ये  भाजपा की दवाई हे नहीं लगवानी हे,, अगर एक पार्टी का नेता ऐसा बोलता हे तो उसके समर्थक भी उसके साथ,, लेकिन समर्थक कभी नहीं सोचता,, वो नेता हे,, उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा उसके पास पैसा हे पावर,, तुम्हारे  पास क्या,, बाबा जी का घंटा अब हिलाओ बैठकर ,, अगर इस सबको कोई ठीक कर सकता हे तो वो मीडिया,, लेकिन वो बिका हुआ हे। 
मेरा अपना अनुभव हे,,सच कितना नज़र आता हे,, वो भी बँटा हुआ हे,, आज लोग ये कहने मैं ज़रा भी संकोच नहीं करते की कौन सा चैनल  किस पार्टी को सपोर्ट करता हे ,, ओर इसी वजह से आज जनता किसी मीडिया कर्मी का सम्मान नहीं करती हे,,
अगर कोई ईमानदार नेता या अधिकारी आ भी जाए तो उनको ख़त्म करने मैं वक्त नहीं लगता हे,, लेकिन सारा दोष मेरी नज़र मैं देश की जनता का हे क्योंकि वो उनको चुनती ही नहीं जो हक़दार हे देश को चलाने का वो उसको चुनती हे जिसमें उसकी जाति नज़र आती हे ओर इसी का फ़ायदा उठाता हे नेता,, आज आँक्सीजन की वजह से जाने जा रही हैं ।
वक्त रहते अगर देश की जनता नहीं सुधरी तो बची खुची हवा भी नहीं मिलेगी।क्योंकि नेताओं ने प्रक्रति को बाँट दिया वो कैसे ये पीपल का पेड़ हे हिंदुओं का हे ये इमली का पेड़ मुसलमान का हे ये जो पेड़ आपको पूरे समय जीवन यानी O२ देता हे हम उसको ही काट देते हैं ओर अपनी साँसों की लम्बाई कम कर देते हैं।
हम पेड़ लगाते कम काटते ज्यदा हैं ।
हम तो यही कहेंगे देश को अगर आने वाला कल अच्छा देना चाहते हो तो उनको चुनो जो सिर्फ़ देश ओर जनता के लिए सोचते हैं   ना कि हिंदू, मुस्लिम या जाति के लिए लड़ते हैं अभी भी वक्त हे,, जनता अगर  समझे तो,,, 
नीरज तिवारी 




मंगलवार, 4 जून 2019

मेरा गाँव बदल रहा हे


कहते हैं कि भारत को क़रीब से देखना हे तो भारत के गाँवों को देखो ।
लेकिन ऐसा  क्या हे जो गाँव की तरफ़ जाने का रुख़ किया जाए , वही गंदगी ,कीचड़
अनपढ़ ज़ाहिल लोग ,,, ये सब अब बदल रहा हे जबसे सांसद आदर्श ग्राम योजना की शुरुआत हुई हे ,और आपको आज ले चलता हुँ छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गाँव मोहलाई में जहाँ मैंने गाँव की अवोहवा को बदलते देखा ,,
मुम्बई से रायपुर की दूरी हवा में पुरी की और उसके बाद क़रीब ४५ किमी की दूरी कार से ,, और दुर्ग के सरकारी सर्किट हाउस में समान रखा ।
और कुछ देर में हम सब वापिस गाँव की तरफ़ चल दिए ,
मन में कई सवाल क्या वाक़ई गाँव बदल रहा हे
और इस गाँव को गोद लिया था मोतीलाल वोरा जी ने रास्ते में जाते हुए एक बोर्ड पर उनका नाम लिखा हुआ था ।
गाँव की हद में जैसे ही क़दम रखा रोड के दोनों तरफ़ कही गंदगी का नमोनिशान नहीं था ।
हमारी कार गाँव की गलियों से होती हुई सीघा पंचायत भवन के सामने रूकी जहाँ पर गाँव के सरपंच ने हमारा स्वागत किया, जिनका नाम भरत निषाद एक दम जवान उम्र होगी क़रीब तीस के आस पास
गाँव की पक्की सड़क और वहाँ का माहौल ख़ुद व ख़ुद अपनी कहानी बयां कर रहे थे।
तभी गाँव के सरपंच ने चाय पानी का प्रबन्ध कर दिया ।
पंचायत भवन के अंदर कम्पुयटर और वाई फ़ाई का भी प्रबन्ध था । और उस कम्पुयटर पर मैंने देखा की कुछ सी,सी ,टी वी कैमरों की तस्वीर आ रही थी 
सरपंच की तरफ़ जैसे ही मैंने देखा । वो समझ गये कि हम क्या जनना चाहते हें
ये आप जो सी सी टी वी की तस्वीर देख रहे दरअसल ये हमारे गाँव के स्कुल की हैं
लेकिन इसको लगाने से क्या फ़ायदा हे
जब से ये कैमरे लगे है मास्टर टाईम पर आने लगे है और पढ़ाई भी ठीक होने लगी और तो और हमको सब पता चलता हे कि स्कुल मै क्या हो रहा हे ।
तभी सरपंच जी ने हम सब को बोला लंच का भी समय हो रहा हे आप सबका आज का खाना इसी स्कुल में हे।
और हम सब स्कुल के अंदर थे।
साफ़ सुथरा स्कुल सारे बच्चे स्कुल की ड्रेस में जैसे ही क्लास में क़दम रखा की सारे बच्चों ने खड़े हो कर हमको गुडऑफ्टर नून बोला ,,
बच्चों को जवाब दिया और बाक़ी क्लास की तरफ़ चल दिया
स्कुल की दिवारों पर ज्ञान की ढेर सारी बातें लिखी हुई थी ।
तभी घंटी बजने की आवाज़ सुनाई दी मालूम चला कि बच्चों का खाने का समय हो गया ।
मन ने सवाल किया क्यों न स्कुल की रसोई को भी देखा जाए
साफ़ सुथरी रसोई और ताज़ा पकता खाना मेरे मुहं में भी पानी आ गया
कुछ पल के लिए में अपने आप को अपने बचपन के स्कुल की तरफ़ चला गया जहाँ मुझे भी हफ़्ते में एक दिन दलिया मिला करता था ।
तभी मुझे मेरे साथी ने आवाज़ दी की बच्चे अपने हाथो को घो रहे हे
मै रसोई से निकल कर उस तरफ़ चल दिया जहाँ सारे बच्चे लाइन में लगे हुए थे ।
और फिर स्कुल के गलियारे में सभी बच्चों को खाना परोसा गया
स्वाद था खाने में क्योंकि हमने भी वही मिड डे मील खाया ।
सच सांसद आदर्श ग्राम बदल रहा हे
गाँव में हर घर में शौचालय कोई भी गाँव के बहार शौच को नहीं जाता हे ये हमको सरपंच ने बताया ।
और क़रीब तीन दिनों में हमको कोईनजर नहीं आया
जब हमने गाँव में रहने वाली एक औरत से पुछा की क्या बदलाव हुआ हे जब से गाँव को गोद लिया हे
तो प्यारी ने बोला जो कि उसका नाम था
कि जब शौचालय नहीं था तो बरसात हो या कोई भी समय बहार ही जाना हे शरम भी आती थी ।
और गदंगी सी बीमारी भी लेकिन अब न तो गंदगी हे और न ही मच्छर और मक्खी
गाँव में सौ प्रतिशत शौचालय हे और ये सब गाँव के हर शख़्स ने सरकार के साथ मिलकर पुरा किया हे
सरकार ने ग़रीब तबके हर व्यक्ति को क़रीब १२००० रू दिए जिससे आज हर घर में शौचालय हे ।
प्यारी कहती हे जो कि उस गाँव में रहती हे कि जब से हर घर में शौचालय बन गएे है मक्खी और मच्छर भी नहीं हे
जिससे अब बीमारी भी नहीं होती हे ।
प्यारी तो ये समझ गई लेकिन शहर के पढ़े लिखे लोग कब समझेंगे
सरकार और आम आदमी अगर जुड़ जाए तो गाँव क्या शहर की भी समस्या हल हो जाए।
गाँव के सरपंच ने सरकार के साथ मिलकर हर घर को दो - दो डस्टबीन दिए जिसमें कचरा डाला जाता हे और हर रोज़ सुबह ट्रेक्टर आता हे हर घर के सामने सीटी बजाता हे और कचरा ले जाता हे जिससे जैविक खाद बनती हे और जिसको जला सकते हे जला देते हें ।
यहाँ गाँव के लोगों का संकल्प हे जिसे शहर के लोग नहीं निभा पाते हे उनको तो लगता हे मोदी आएगा और उनकी गली मोहल्ला साफ़ करेगा वाह रे शहरी आदमी तुझ से तो अच्छे गाँव के मानुस हैं
सरकार की इन्हीं योजना में एक सोलर ऊर्जा का उपयोग हे जिससे गाँव बालों ने दो बड़ी सी पानी की टंकी लगाई हैं जिसका पानी २४ घंटे गाँव बालों को मिलता हे और पेड़ पौधों को भी ।
सरकार की आँगनबाडी योजना में मैंने जो देखा वो भी कम क़ाबिले तारीफ़ नहीं हे
अन्न प्रसन्न योजना गाँव के वो बच्चा जो कि अभी पैदा हुआ हे। उनकी माँ और बच्चे को आंगनबाड़ी में अन्न खिलाया जाता हे और तो और जिनकी बेटियाँ हे उनको सरकार एक मुस्त कुछ रक़म देती हे जो कि उस बालिका के बड़े होने पर मिलती हे सच ये थोड़ा थोड़ा कर के गाँव शहर से ज़्यादा तरक़्क़ी तर रहे हे
आंगनबाड़ी में छोटे बच्चों को पढ़ाने का ढंग भी बहुत ख़ूब साफ़ सुथरे कपड़ों में सारे बच्चे बहुत प्यारे लग रहे थे।
गाँव में रहने वाले कुछ बुज़ुर्गों से पुछा कि जब से गाँव सांसद आदर्श योजना से जुड़ा हे तो क्या गाँव में बदलाव हुआ हे ।
इतना पुछना था की सभी के चेहरों पर चमक आ गई ।
हाँ बदलाव हुआ हे सड़क बन गई पानी आ गयो और गाँव में अब कोई शराब भी नहीं पीता हे ।
तभी एक बुज़ुर्ग ने कहा गाँव के नाम के साथ अगर आदर्श जुड़ जाए तो गाँव के हर व्यक्ति को ख़ुद में भी आदर्श बनना पड़ता हे।
सही बात कही थी । मैंने सोचा क्यों न गाँव का एक चक्कर लगाया जाए
और सरपंच से बात की सरपंच जी ने हमको एक बाईक दे दी और उसको चलाने वाला आदमी फिर क्या हम गाँव की गलियों की तरफ़ चल दिए साफ़ गलियाँ तभी देखा एक माँ अपने बच्चे को स्कुल भेज रही थी ।
मैंने अपनी बाईक को वहाँ पर रोक लिया और माँ बेटे के कुछ शॉट लिए तभी मैंने उस औरत के घर के बाहर लिखा देखा कि इंदिरा आवास योजना ,,
मैंने उस औरत से पुछा कि क्या ये घर आपको सरकार ने दिया ।
हाँ मेरा घर तो मिट्टी का था बरसात में बहुत परेशानी होती थी ।लेकिन एक दिन सरपंच जी आए और उनके साथ एक और जन थे ।
उन्होंने हमें इंदिरा आवास योजना की जानकारी दी सारे पेपर लिए और सरकार की तरफ़ से पैसा मिला और आज हमारा पक्का घर हे अब चाहे सर्दी हो या बरसात कोई दिक़्क़त नहीं कहते कहते उस औरत ने सरपंच और उस आदमी को ढेर सारी दुआएँ दे डाली ।।
हम एक बाक फिर से गाँव की गलियों में चल दिए ।
सच सरकार गाँव के विकास के लिए क्या कुछ नहीं करती हे ।
लेकिन उसको सजों कर रखना उस गाँव के लोगों पर बनता हे ।
तभी उस गाँव की गली में मैंने एक नर्स को जाते देखा जो कि अपने साथ दो औरतों को लेकर जा रही थी ।
मन नहीं माना पुछ लिया कि कहाँ जा रही है
एक गर्भवती महिला के घर जा रहे हे नर्स ने चलते चलते ही बोला
मैंने भी साथ चलने की बात और चल दिया उस घर में जा कर उस नर्स ने एक महिला का चेकअप किया पूरा और पूरी जानकारी दी ,क्या खाना हे क्या नहीं और ज़ोर दे कर बोला कि जब बच्चा हो तो सरकारी अस्पताल में ज़रूर जाना , उस औरत ने हाँ बोला मैं जब ये सब देख रहा था ,
मुझे लगा सच गाँव बदल रहा हे ,
लेकिन मुझे ये समझ नहीं आ रहा था कि शहर कब बदलेंगे ।
जब आप मुम्बई की तरफ़ आओ तो रेलगाड़ी मै जब आप होते हो तो पटरियों पर दोनों तरफ़ आपको गंदगी और लोग शौच करते नज़र आएँगे ।
लेकिन स्वच्छ भारत गाँव में नज़र आता हे
जब मै बहुत छोटा था और अपने गाँव जाता था एक ही तालाब था और गाँव के लगभग सभी लोग उस तालाब में नहाते थे और उसी में गाँव के जानवर भी और तो और शौच से निवृत्त हो कर लोग उसी तालाब में साफ़ भी करते थे
सोचो उस तालाब का पानी कितनी बीमारियों का घर होगा ,
लेकिन आज जब इस गाँव में देखा तो तालाब दो थे , लेकिन अलग अलग , आदमियों के लिए अलग और जानवरों के लिए अलग ,
सच हर गाँव का सरपंच अगर निषाद जैसा हो तो गाँव को शहर बनने मै वक़्त नहीं लगता हे
और इस सब मैं सरकार भी पूरी इमानदारी के साथ लग जाए तो सोने पे सुहागा
आज मोहालाई गाँव आदर्श गाँव हे और वहाँ के रहने वाले लोगों की सोच आदर्श ,
लेकिन किसी गाँव या शहर में रहने वाले हर व्यक्ति की सोच पर निर्भर करता हे न कि किसी एक व्यक्ति पर ,
ज़िम्मेदारी सामूहिक होती है न कि किसी एक की,
फिर इंतज़ार कैसा आज से ही आप अपनी ज़िम्मेदारी निभाने की शुरुआत कर सकते हैं और अपने गाँव शहर को बदल सकते हे
क्योंकि हर गाँव बदल रहा हे

नीरज तिवारी 


रविवार, 27 जुलाई 2014

मुझे याद हे जब से मैंने दंगे देखे या सुने हैं कभी कोई नेता नहीं मरता है |मरता हे गरीब इंसान, ओर  नेता उसकी मौत पर बस रोटी सेंकता हे|
1994 जब मैंने मीडिया मैं कदम रखा ओर आज तक ऐसे कई मोकों को देखा हे | दंगो की शुरुआत जब कभी भी हुई बजह कोई मामूली रही ओर
उसको बाद मैं तूल दे दिया गया | आखिर हम कब जा कर समझेंगे हम अपने बच्चों को कोंन  सा कल देना चाहते हैं  ,नफरत से भरा कल या
प्यार से भरा कल | ये एक अजीब सी पहेली हे, हैं तो हम इंसान लेकिन बाँट कर रख लिया ये, हिन्दू, ये मुसलमान, ये सिक्ख, ये ईसाई, ओर
धर्म के नामपर एक दूसरे का सिर फोड़ते रहते हैं  | अगर बाजुओं मैं  इतना ही जोश है, तो देश, शहर, गाँव के विकास के लिए लगाओ |लेकिन
वो जिम्मा किसी ओर का हे हम तो सिर्फ गंदगी करेंगे
अभी कुछ महीनो पहले मेरे शहर मैं ऐसा ही दंगा हुआ था ,बात बड़ी मामूली थी |एक मस्जिद के सामने  बुजुर्ग इंसान ने अपने हाथों को पानी से
धो लिया, ओर उसके वो हाथ धोने की वजह ने दंगे का रूप ले लिया, ओर जिस शख्स ने ये किया जैसा मुझे पता चला वो मेरा दोस्त था |
जब हम कभी साथ होते थे ,मुझे कभी नहीं लगा कि वो ऐसा कर सकता हे, उसकी सोच बहुत परीपक्व थी |लेकिन उस वक़्त जब ये हुआ वो
बेरोजगार था | दिमाग से भी काम से भी ओर उसका फ़ायदा उठाया उन नेताओं ने जो कि सिर्फ इंतज़ार करते हैं, कब ऐसा हो ओर आग मैं घी 
डालें | भाई ये घी बहुत महंगा है ,ऐसे घी को खरीदना बंद करो देश ओर अपनी तरक्की के लिए कुछ करो | एक बात मुझे ओर खलती हे इन
नेताओं की अगर कहीं दंगे हो गए तो आरोप एक दूसरे पर क्यों लगाते हो ये देश ये शहर आपका हे क्यों नहीं एक साथ जा कर रोक देते हो इन
दंगो को,  लेकिन अगर ये ऐसा करेंगे तो हवन मैं हाथ कैसे सेंकेंगे | ये जनता कब समझेगी उखाड़ फेंको ऐसी सरकार को ऐसे नेताओं को जो
हमारे अपनों की लाशों पर नेता गिरि करते हैं , हम तो कहते हैं , मानना ना मानना इस मूर्ख जनता का हे जो समझती तो सब कुछ हे लेकिन
उसको वही करना हे जो उसके नेता चाहते हैं ,धन्य हो ऐसी जनता का |
बाँट लो सुख जो दुख बांटते हो
क्यों अपने कल को बांटते हो 
मर गया तो क्या जबाब देगा 
तेरा बच्चा जब तुझसे सवाल पूछेगा 
खौफ ना खुदा का ना भगवान का हे 
वो भी यही कहता हे हम एक हैं 
फिर क्यों बांटते हो चिल्लर की तरह खुद को 
डर उस खुदा, भगवान से जो तुझे 
कहता है
प्यार कर ...
मुझे याद हे जब से मैंने दंगे देखे या सुने हैं कभी कोई नेता नहीं मरता है |मरता हे गरीब इंसान, ओर  नेता उसकी मौत पर बस रोटी सेंकता हे|
1994 जब मैंने मीडिया मैं कदम रखा ओर आज तक ऐसे कई मोकों को देखा हे | दंगो 

बुधवार, 19 सितंबर 2012

तुम धवल हो मेरा कल हो
तुमसे अब मैं क्या कहूँ
सोचता हूँ चुप रहूँ
साथ बस chलता रहूँ

तुमसे ही पाता हूँ मैं
प्रेरणा   जीवन की अक्सर
देखता जब भी हूँ मैं
तुम खड़े हो मेरे पथ पर

शाम हो या फिर सुबह
तुम ख्यालों मैं हो अक्सर
तुम बनो छाया मेरी
जब चलूँ जीवन के पथ पर




 रात भर चलता रहा चाँद
मेरे संग सफ़र मैं
मै  भी तन्हा वो भी  तन्हा   
दूर थे पर थे सफ़र मैं

शहर गुज़रा गाँव गुज़रा
और गुज़रा उनका घर
जिनसे मिलने को तरसते
हम रहे उम्र भर

कह सके न ढाई आखर
बस अधर हिलते रहे
प्रेम के एक बोल को
सुनने को तरसते रहे

रात  भर चलता रहा 
चाँद मेरे संग सफर मैं
मैं भी तन्हा वो भी तन्हा
दूर थे पर थे सफ़र मैं
कर के यकीं
हम तुम पर तो
सब कुछ
अपना वार गए    

लिख दिया कलम से
कागज़ पर
वो चाँद अछ र  मुझको मार गए
कुछ कहा नहीं कभी कोयल ने
पपीहे की पीऊ से हर गए

कुछ ऐसे कारे बादल बरसे
मेरे आंसू उनके साथ बहे
फाल्गुन के टेसू और पलाश
रंग ऐसे मुझ पर डार गए

चालत डगर टोंके हैं लोग
हाय जिंदा मुझको मार गये
बोलत नैना रीझत थे हमको
मुस्कान अधर की साथ लहे

मन ही मन तुम सोचत ही रहे
हम अभिलाषा का हार लिए
इस दुनिया से हार गये   

सोमवार, 17 सितंबर 2012

मन से दूर ख्यालों मैं
तेरे बारे मैं सोचा करते हैं
कैसा होगा उसका चेहरा
हर चेहरे को देखा करते है

क्या होगा चाँद सा मुखड़ा
या नैन तेरे हिरनी से
चलती होगी जब बल खाके
नागिन सी इस जमीं पे

केशु होंगे जैसे अम्बर पे
फैली काली घटाएँ
दो कलियाँ तेरे होंठ के प्याले
मधुरस पीने को चाहें

तेरा योवन सावन भादों
जैसे पतझड़ आने के बाद
खिल उठते हैं फूलों के बाग़
कोमल तेरी देह के जैसी
गुलाब की पंखुड़ी

टूट न जाये ये सपना मेरा
जो हम देखा  करते हैं
मन से दूर ख्यालों  मैं
तेरे बारे मैं सोचा करते हैं
मैं लिखूं तुम पर कविता
या मंगल गीत लिखूं
या साँझ सकारे चोबारे मैं
बस तुमको देखुं

कैसे कह दूँ
मृगनैनी से नैन तुमाहरे हैं
तुम बैठी अमराई पर
क्या कोयल हे

या बसंत ऋतू की
अम्बर से गिरती
रिमझिम बुँदे हो

मेरे  ह्रदय पर आछादित
तेरी शोख आदाओं का जादू
न आए तूं हर मौसम मैं
मैं कैसे कह दूं

तेरे जन्मों की परिभाषा
क्या यही हे मेरी अभिलाषा
इन उपमाओं की अभिलाषा मैं

क्या तूं हे मेरे
जीवन की आशा
कर के यकीं हम तुम पर तो
सब कुछ अपना वार गए
लिख दिया कलम से कागज़ पर
वो चंद  अछऱ   मुझको मर गए
कुछ कहा नहीं कभी कोयल ने
पपीहे के पीऊ से हर गये
कुछ ऐसे कारे बादल बरसे
मेरे आंसू उनके साथ बहे
फाल्गुन के टेसू और पलाश
रंग ऐसे मुझ पर डार गए
चलत डगर टोंके हे लोग
हाय जिंदा मुझको मर गये
बोलत नैना रीझत थे हमको
मुस्कान अधर की साथ लहे
मन ही मन तुम सोचत ही रहे
हम अभिलाषा का हर लिए
इस दुनिया से हर गये

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

पतझड़

शाम की आगोश से
सिमट कर जब रात आती हे
लगता हे ये पेड़ों की पतियाँ भी ,
सो जाती हैं
लगता है मेरी तरह ख्याब नहीं देखती है
लगता हे ये अपनी
पीर्यतम टहनियों से प्यार करती हैं
इसीलिय चुपचाप मंद मंद हवा के
गीत गाती
सो जाती है
रात को जब हवाओं के झोंको मैं
ये झूमती
लगता है ये जैसे
कोई स्वप्न देखती है
और नाचती गाती है
इसीलिय ये कभी
इधर बल खाती है कभी उधर बल खाती है
और जीए जाती है
ये पेड़ों की पतियाँ
ये ज़ालिम मोसम
इन्हें अपने प्रीतम टहनी से
प्यार भी नहीं करने देता है
इसलिय पतझड़ के मोसम मैं
हर पाती सुख जाती है
और अपनी प्रीतम टहनी से
बिछुड़ जाती हैं
ये टहनियां

बुधवार, 30 नवंबर 2011

बीती रत

बीती रत चला मैं


साँझ को सस्नेह विदाई देके


अनमने से अनजाने पथ पे


मुझे देख रहा रहा था कोई


हा वो मेरी करीब की साथी थी


जो हमेशा मेरे गले मैं


गलबैयां डाले रही हे


बहुत चाहती हे वो मुझे


मैंने जब bhi उससे


अपने से अलग करने की कोशिश की


उतनी ही वो मेरे और करीब आ गई


कमबख्त मरती भी नहीं


उसकी चिता भी नहीं जलती


हाँ क्योंकि


वो मेरी चिरसंगनी हे


हाँ जब मेरी चिता जलेगी


तभी वो मेरे साथ सती होगी


हाँ मेरी गरीबी


वर्षा

टिप टिप ठपर-ठपर
छोड़ के अपनी डगर
ये बहता हे
पानी किधर
ये तो वर्षा रानी
जो नाच रही झूम झूम के
पट पट
बहुत जोर के बुलबुले उठते
लिए बहुत अरमान
पल भर मैं गायब हो गए
घास फूस पेड़ों की पति
चमक उठी आज तो साथी
झूम उठा जामुन का पेड़
कहता हे वर्षा रानी से
क्या खूब किया तुमने कमाल
अब फल फूलेगी मेरी जामुन
खायेंगे ये बच्चे नादान
तभी जोर से बदल धड़का
बिजली को de आदेश तो kadka
जाके गिर कहीं पर
ओ मेरी बैरन
बिजली फिर जोरों से कडकी
भागे घरों को लड़के लड़की

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

मैं चाहूँ

मैं चाहूँ कोई मुझे प्यार करे
थपकी दे दे दुलार करे
सरे राहों मैं पकडे
बैयाँ मोरी
कोई ऑंखें मुझ से चार करे
मतवारे कमल के नैनं से
शबनम जैसे मोती हैं गिरे
पीलूं होटों से मैं उनको
मदिरा की जरुरत फिर न परे
मैं चाहूँ मुझे कोई प्यार करे
पाजैब पैर मैं पहनोंऊँ
सिंदूर से उसकी मांग सजाउँ
छोड़ बाबुल का देश वो गोरी
मेरे आंगनवा पांव धरे
मैं चाहूँ मुझे कोई प्यार करे
जब छाए गम की बदली
वो अपना आंचल लहराए
जीवन की डगर पर चलने को
वो पथ मैं खड़ी इंतजार करे
मैं चाहूँ कोई मुझे प्यार करे

पानी

अब तो राहों मैं गर्म लपटें चलती हैं
जो इस मर्मर देह को जलती जाती हैं
कुछ ही दूर चलता हूँ कि
मुहं प्यास से सूखने लगता हे
लेकिन प्यास कैसे बुझाऊ
पानी भी अब पैसे मैं बिकता हे
इसलिए उस पानी से
अब प्यास नहीं बुझती हे
यहाँ कहानी का अंत नहीं अनंत हे
क्योंकि यहाँ पे इंसानों का खून पीने वाले कुछ ऐसे संत हैं
जो आदर्श चिंतन का ढोंग रचते हैं
लेकिन फिर भी नहीं मरते हैं
क्योंकि
वो भैंसा बाला भी डरता हे
इसीलिय हर रोज़ एक ईमानदार मरता हे मैं सिहर उठता हूँ क्योंकि मैं हर रोज़ मरता हूँ
इसलिय उनसे कहता हूँ
पानी मत बेचो
क्योंकि मेरी तरेह हर रोज़ कोई नहीं मरेगा
इसलिए उसे गर्म लपटें भी शीतल प्रतीत होंगी
उनका मुहं प्यास से नहीं सूखेगा
और भैंसा वाला भी उन सफ़ेद पोशों से नहीं डरेगा

सुबह की शाम

जब हमारे पग उठे
बेहताशा पूरब की और
दिल मैं सागर हिलोरे लेने लगा
और पुरबिया की बयार
होले होले मेरे तन के मन के
पास से गुजरने लगी
मुझे एहसास होने लगा, तेरी खुशबु का
चेहरे पर
कई बार टकराकर चली गई
और भीगी भीगी ओस की कुछ बुँदे
मेरे माथे पर गिरीं एहसास हुआ
तेरे अश्कों का मैं सोया हुआ सा जग उठा
चोंका सा
हाथ मैं कलम और अपनी अँगुलियों से जब तू सो रही थी
और मैं सफ़र मैं था
तेरे सपनों की माला बुनने के लिए
चन्दन से लिपटे सर्प की खुशबु के साथ
और ठंडी ठंडी हिमालय की चोटियों को जगाकर
क्या तू इतना सोई
कि अंतरात्मा का जबाब भी न दे
मैं आ रहा हूँ तेरे सपनों को तोड़ने
तेरे पास हकीकत मैं
क्या तू अब नहीं उठेगी
भोर कि बेला मैं
उगते हुए सूरज मैं क्या मेरा चेहरा नहीं देखेगी

स्वर्ण लालिमा सी प्रतीत होगी
जब तेरे चेहरे से उसकी किरने टकराएंगी
मैं मर के जी उठूँगा
छह पल भर के लिए
लकिन तू मुझे अपना बनायेगी
मैं किसी अंजन से नहीं कहूँगा
कि कभी तुने मुझे चाहा था
मैं भूल जाऊंगा कि गाँव की पगडंडी पर तुम्हारे कांधे से कन्धा मिलाकर चला था
हाँ मुझे सकूँ मिला था
मैं कोई शिकायत नहीं कर रहा हूँ
भूल जाने की
लेकिन क्या तू मुझे भूलेगी
तेरा वो दुर्घटना मैं
एक गिफ्ट का पैकेट देना
बड़ा रास आया
मेरे पास अभी तक मोजूद हे
मे उसे संजो कर रखूँगा
अपने सग्रहालय मैं
क्या तुम देखने आओगी
नहीं हाँ न
चलो कोई बात नहीं
लेकिन तेरे साथ सिनेमा देखने जाना
मुझे याद रहेगा
बीच मैं हमारे बैठा
मैं सोच रहा था वो कब उठे
और हमारे फासले कम हो
मैं उदास हो चला

और सीडियों की
मुंडेर पर आकार बैठे गया
लेकिन क्या तुने सोचा मेरे दिल पर क्या बीती
लेकिन नहीं
तू हंसती रही
उस हंसी मे एक दर्द का एहसास हुआ था मुझे
जो मेरे तन मे सुई सी चुभो रही थी
जैसे कोई खजूर की पाती
हाँ तुने पाती भी दी मुझे
पहली पाती
उसी दिन तो सिनेमा देखा था
बड़ा हंगामा हुआ था गाँव मैं
बड़ा मज़ा आया
लेकिन तुम जब रोई
तो मुझे बहुत बुरा लगा
सिर्फ तुम हंसती रहो
मे यही तो चाहता हूँ
तुम ने कहा
मेरे शब्दकोष मैं कोशिश शब्द नहीं
लेकन यह सब कोशिश ही तो था
जो मैंने तुमसे और तुमने मुझ से की
और जाने के बाद जो तुमसे बातें कि
वो अधूरी थी उन्हें पूरा करने आ रहा हूँ
तुम्हारा वो बड़े प्यार से दम आलू बनाना और
अपने और मेरे गम को भूल जाना
तुम यों ही न भूल जाना प्यार से खिलाना
तुम्हें चम्मच नाम देना
तुम्हें बुरा तो नहीं लगा मैं फिर कभी नहीं कहूँगा
तुम्हरी सों
धीरे -धीरे प्रातः कालीन बेला आने वाली हे
और तुम अलसाई अंगड़ाई सी उंनीदी सी
उठने वाली हो

मेरी सुबह की उजाला
मेरे होंठों का प्याला
न मुझ से भूल हुई चलो अब माफ़ भी कर दो न
तुम मेरा साथ दोगी न
तुम हंसती
और
जागती ही मिलना

चेहरे पर सुबह की लालिमा लिए
मैं आ रहा हूँ
मेरी सुबह की शाम

माया

मैंने एक बार सोचा की
मैं अपने अतीत झाँककर तो देखूं
लेकिन मेरा अतीत मेरी हंसी उडाने लगा
माया का नाम न जाने कहाँ से लेने लगा
मेरा अंतर्मन चोंका बिना शिकन लिए चेहरे पे
क्योंकि भरोसा था मुझे अपनी माया पे
क्योंकि वो हमेशा मेरे साथ चलेगी
और फिर मैं अपने अतीत मैं झाँकने लगा
मुझे मालूम भी नहीं था कि
कब उस बैरन माया ने मुझे छला
मेरे पग कब बढ चले उस और
फिर मिला मुझे परिचय पत्र
बस यहीं से शुरू होता हे
फिर न विराम लेने वाली माया का इतिहास
लेकिन सम्पूर्ण नहीं हुआ
पता नहीं उसकी किस
अदा ने मुझे छला
और मैं भूलकर शेह्तुत से भी मीठे
इमली से खट्टे कागज़ पे
और उस भोली सी माया ने
मुझे अपने आँचल की चाय मैं
विश्राम दिया
अधुरा ठहराव था वो
जो की पूरा न हुआ
आज भी जब मैंने
उस बिंदु से पूछा
तो पता चला की

वो पराई हो गई हे
लेकिन क्या वो सकुचाई होगी
मेरी याद आई होगी
नहीं माया माया हे
न मेरे पास न उसके पास
आज भी जब कहीं माया का जिक्र आता हे
मेरा अतीत मुझे कोसने लगता हे
पता नहीं ये माया
हर किसी को क्यों भाती हे
क्या अब भी माया को मेरी याद आती होगी
बस स्म्रेतियाँ ही बाकी हैं

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

kalam


अब ये कलम किसी को न दूंगा 
जब भी लिखूंगा इसी से लिखूंगा 

हर सब्द को जादुई रंग मैं रगुंगा
अब इस कलम से नया इतिहास रचूंगा                                                                                                अब ये कलम किसी को न दूंगा

है स्याही मैं इन्द्रधनुषी रंगों का समावेश

जैसे अनेकों संस्क्रती मैं बंटा भारत देश 
जिसके पग पग पर बोल और बदले है भेष
 लेकिन जिसकी परिभाषा है,  चाहत नहीं किसी से द्वेष 
ऐसे ही शब्दों को तुमको अर्पण मैं करूँगा
कभी गीत कभी ग़ज़ल मैं लिखूंगा
 प्रेम मैं विरह के गीत अब तुझे न दूंगा
सात स्वर संगीत के सजे कुछ ऐसा लिखूंगा
अधर पे हो ख़ुशी प्रीत ऐसी मैं करूँगा
क्या ये सब मैं लिख सकूँगा

vishvas

विश्वास
किया अपने आप पर  
दूंगा उस बिखरी को च्वनी 
बस  स्टाप पर 
जो मुझे रोज़ मिलता 
फैलाता हे हाथ हर के सामने 
पर उनमें से किसी एक सिक्का मिलता हे 
उसका उस जगह तोज मिलना
और मेरे विश्वास का ,रोज़ दमन होना 
क्या साबित करता हे 
यही की जब खुद न कर सके विश्वास 
तो किसी और पर कैसे होगा इस तरकी के माहोल मैं 
हर आदमी के विश्वास का रोज़ हनन होगा 
यह विश्वास इन्सान को इन्सान के  प्रति बैरी बना रहा हे 
फिर भी इन्सान विश्वास किये जा रहा  हे

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

hreday

नदियाँ जैसे करती कल कल 
चलती हैं हर पल अविरल 
वैसे ही देख तुमेह पिर्ये 
मेरा ह्रदय करता हलचल
नील निलय अम्बर के नीचे 
जब सुनता हूँ  पंझी का कलरव 
वैसे ही -------------------- 

मस्त पवन जब चलती हे 
कलियाँ आवें फल फुल लगें 
भँवरे भी मद मस्त हुए गगन मैं 
जैसे तन से तेरे खुसबू फैले  
वैसे ही पीर मेरे ह्रदय मैं उठती हे 
हर पल अविरल  
वैसे ही ===========

सिनेग्ध भरा तेरा स्पर्श 
लगा जैसे कहीं बिजली कडकी 
खोल तभी अपने ह्रदय की खिड़की 
ढूंड रहा हूँ कहीं तूं तो भटकी 
तब आशा और निराशा के छा गए बादल
वैसे ही -------------------------------
खिल कीचड़ मैं कमल हुआ जो                                                                                                                    वो हे कल्पना का अनुगामी 
प्रीत से नाता क्या तोडूं 
मीत मेरा निर्झर निर्मल                                                                                                                            वैसे ही -------------
सरगम सी जब तूं बोली थी
ह्रदय मैं जब मेरे ढोली थी                                                                                                                          अब भीगीं  मेरी ऑंखें हैं 
शबनमी रोज की रातें हैं
अब याद नहीं करता हूँ हरपल
अब नहीं देख तुमेहं पिर्ये
मेरा ह्रदय करता हलचल







शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

chamchon ki jay bolo

बैठा मुस्काया मुहं खोला 
बहुत पुराना चमचा बोला  
सुनो सख्झी है जग सारा 
लम्बा हे इतिहास हमारा 
चमचा नर चमची नारी हे 
चमचों की संतित सारी हे 
कोई बड़ा हे कोई छोटा हे  
यह पतला वह मोटा हे 
यह इस अफसर का चमचा हे 
और वह घर घर का चमचा हे
यह चमचा हे घर वाली का 
और वह चमचा हे साली का 
सत्य सनातन है यह प्यारे
चमचे ही चमचे  हैं सारे   
मीठे मीठे बोल सुनाये                                                                                                                           चमचे सब संताप मिटायें 
जय बुलति जो बार बार हे 
चमचों  का ही चमत्कार हे  
बिगड़ रही हो बात बना लो  
जो चाहो वो कम करालो  
हाकिम के चमचों पर जाओ 
हाथ जोड़ कर भोग लगाओ 
अंतर की आँखों को खोलो
बोलो चमचों की जय बोलो   
मूलमंत्र ये रखो याद 
चमचा गीरी जिंदाबाद